कहानी पढ़ो, कटिंग इकट्ठा करो और पाओ इनाम
इन विधायक जी आवास पुराना विधायक निवास जिसे ओ.सी.आर. कहते हैं, में था। विधायक जी का घरेलू नौकर बीती शाम को जरूरी काम से घर चला गया था। विधायक जी ने सुबह उठकर पूर्ण अनौपचारिक लिवास में खुद अपने लिये मग भरकर चाय बनायी और पालथी मारकर चाय के मग के साथ अखबार पढ़ने बैठ गए। विधाायक जी अभी चाय की दो-चार चुस्कियां और अखबार की दो-चार सुर्खियांे का ही आनंद ले पाए थे कि बेहद कर्कश तरीके से उनके दरवाजे की घंटी बजी। घंटी बजने के स्टाईल से ही विधायक जी समझ गए कि आने वाले उनके क्षेत्र के मतदाता हैं। भारी मन से उन्होंने दरवाजा खोला तो एक दर्जन लोग जिसमें आधे बूढ़े और आधे युवा थे, दरवाजे पर खड़े दिखाई दिए। विधायक जी ससम्मान उन्हें घर के अन्दर ले कर आए और पूछा “चाय पीयेंगे आप लोग?” आगन्तुकों में से एक बूढ़े ने बेरूखी से उत्तर दिया, “विधायक जी आपकी बहुत चाय पी ली अब कृपा मत करो।” विधायक जी ने बैठने को कहा तो इन दर्जन भर आगन्तुकों में से कोई नहीं बैठा सभी खड़े थे। थोड़ी देर की खामोशी के बाद एक दूसरे वृद्ध ने कहा, “विधायक जी हमारे गांव की सड़क कब बनैगी?” विधायक उन्हीं की बिरादरी के थे और मजे हुए राजनैतिक खिलाड़ी। एकदम बोले, “आप के गांव की सड़क! वह तो कब से मंजूर पड़ी है। पैसा भी रिलीज हो गया है। कल डी.एम. का तीन बार फोन आया बड़ी मुश्किल से रूकवा पाये हैं वरना कब की सड़क पक्की बन गयी होती।”
विधायक जी के ऐसे उत्तर की आशा उन आगन्तुकों में से किसी को भी नहीं थी। विधायक ने अपनी बात स्पष्ट करते हुए अपने इन सजातीय बन्धुओं को समझाया, “यह बताओ तुम्हारे खेतों के पास ज्यादातर बनियों और पण्डितों के खेत हैं कि नहीं। यह भी सच बताओ तुम्हारे जानवर इन्हीं के खेतों की हरियाई खाते हैं या नहीं? पक्की सड़क बन गयी तो दो मिनट में पुलिस घर पे आकर रूकेगी, जानवर चारा सब बरामद कर लेगी और भाग भी नहीं पाओगे। आप लोग कहो तो अभी डी.एम. से हां कर दे तो तुम्हारे बदाऊं पहुंचने से पहले सड़क पक्की बनी मिलेगी।”
विधायक जी के इस अकाट्य, वास्तविक और उपयोगी तर्क का इन आगन्तुकों पर भारी प्रभाव पड़ा और वे सभी सड़क न पड़वाने को अपने विधायक का धन्यवाद ज्ञापित कर वहां से विदा हुये।
सौ-सौ बलिहारी जाऊं अपने बदाऊं के विकास की इस भोली सोच पर।

लेखक :
स्वतंत्र प्रकाश गुप्ता
राज्य सूचना आयुक्त